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दुर्ग में राइस मिलर संगठन अध्यक्ष कांतिलाल बोथरा बीजेपी नेता सजल जैन , बिल्डर विश्वास गुप्ता समेत अन्य पर जमीन बंटवारे और मुआवजा गड़बड़ी के आरोप; कोर्ट के आदेश पर धोखाधड़ी की एफआईआर, पुराने दस्तावेजों से खुलेंगे राज

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शिवगढ़ प्रेस, – दुर्ग में करीब डेढ़ दशक पुराने मेसर्स रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स से जुड़े जमीन और पार्टनरशिप विवाद ने अब आपराधिक जांच का रूप ले लिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी दुर्ग कु. मुस्कान शर्मा के आदेश के बाद सिटी कोतवाली पुलिस ने परिवादी रूपेश जैन की शिकायत पर धोखाधड़ी का अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू की है।

शिकायत में रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स से जुड़े कांतिलाल बोथरा, सजल जैन, विश्वास गुप्ता, मनीष शर्मा और अमृता खंडेलवाल सहित अन्य के खिलाफ फर्म की जमीन, कथित दस्तावेजी हेराफेरी, भूमि बंटवारे और मुआवजा हासिल करने की प्रक्रिया में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पुलिस अब इन आरोपों की जांच करेगी।

कौन हैं तीन प्रमुख नाम?

कांतिलाल बोथरा — राइस मिलर संगठन के प्रदेश अध्यक्ष

मामले में नामजद कांतिलाल बोथरा वर्तमान में राइस मिलर संगठन के प्रदेश अध्यक्ष हैं। शिकायत में बताया गया है कि उनकी माता स्व. कमला देवी बोथरा की फर्म में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। वर्ष 2015 में उनकी मृत्यु के बाद कांतिलाल बोथरा उनके कानूनी वारिस के रूप में फर्म के 10 प्रतिशत हिस्से से जुड़े।

शिकायत में बोथरा की भूमिका को फर्म की जमीन और उसके बाद हुए कथित बंटवारे से जोड़ते हुए कई आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी।

विश्वास गुप्ता — दुर्ग-भिलाई के बिल्डर

मामले में विश्वास गुप्ता का नाम भी फर्म के साझेदार के रूप में सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स में उनकी हिस्सेदारी 18 प्रतिशत थी और फर्म के कामकाज तथा जमीन से जुड़े निर्णयों में उनकी भूमिका थी।

गौरतलब है कि 20 मई 2025 को चर्चित छत्तीसगढ़ शराब घोटाला मामले में ACB और EOW की टीम ने दुर्ग-भिलाई के बिल्डर विश्वास गुप्ता के ठिकानों पर छापेमारी की थी। हालांकि यह जानकारी इस वर्तमान जमीन विवाद की जांच से अलग है।

सजल जैन — भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक

सजल जैन भी रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स के साझेदार बताए गए हैं। शिकायत के मुताबिक उनकी हिस्सेदारी 18 प्रतिशत थी। सजल जैन दुर्ग भाजपा व्यापार प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक रह चुके हैं।

शिकायत में उन पर फर्म के दस्तावेजों और कॉलोनाइजर लाइसेंस से संबंधित प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी तथा फर्म की संपत्तियों के बंटवारे में भूमिका होने के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की सत्यता पुलिस जांच में स्पष्ट होगी।

2009 में बनी थी रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स की पार्टनरशिप

न्यायालय में पेश दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2009 में रूपेश जैन समेत अन्य लोगों ने जमीन खरीदकर उस पर मकान और फ्लैट बनाकर बेचने के उद्देश्य से मेसर्स रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स नाम से साझेदारी फर्म बनाई थी।

इस मामले में कांतिलाल बोथरा , सजल जैन, विश्वास गुप्ता समेत अन्य पार्टनरों मनीष शर्मा, अमृता खंडेलवाल और रूपेश जैन के नाम शिकायत में सामने आए हैं। परिवादी ने फर्म की जमीन को कथित रूप से अलग-अलग हिस्सों में बांटने, दस्तावेजों में हेराफेरी, जमीन अधिग्रहण के संभावित मुआवजे में गड़बड़ी और फ्लैट बुकिंग के नाम पर रकम लेने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

हालांकि, ये आरोप परिवादी की ओर से न्यायालय में पेश किए गए आवेदन और दस्तावेजों पर आधारित हैं। इनकी वास्तविकता पुलिस जांच में स्पष्ट होगी।

2.98 एकड़ जमीन से शुरू हुआ विवाद

परिवादी के अनुसार फर्म ने ग्राम कसारीडीह, गंजपारा नाला के पास करीब 2.98 एकड़ जमीन खसरा नंबर 308/1, 306, 307, 309/1 और 309/2 में खरीदी थी।

योजना जमीन पर निर्माण कर फ्लैट बेचने और उससे मिलने वाले लाभ को पार्टनरों की निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार बांटने की थी।

जमीन खरीदी के बाद सामने आया लैंड यूज का पेंच

परिवादी का आरोप है कि जमीन खरीदने के बाद उसे जानकारी मिली कि खरीदी गई भूमि कृषि उपयोग की है और आवासीय निर्माण के लिए मास्टर प्लान के तहत प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इसके बाद वर्ष 2011 के आसपास फर्म से लगी करीब 3.56 एकड़ अतिरिक्त जमीन खरीदने की योजना बनाई गई। इसके लिए रकम की आवश्यकता होने पर निवेशकों से असुरक्षित ऋण के रूप में पैसा लेने का प्रस्ताव रखा गया।

शिकायत के मुताबिक निवेशकों को निर्माण शुरू होने तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देने और फ्लैट निर्माण शुरू होने के बाद निवेश की रकम को फ्लैट की कीमत में समायोजित करने की बात कही गई थी।

असली विवाद 85 प्रतिशत जमीन के बंटवारे पर

परिवादी ने आरोप लगाया कि बाद के वर्षों में फर्म की संपत्तियों की जानकारी उससे छिपाई गई। उसे कथित तौर पर बताया गया कि रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स बंद हो चुकी है और उसके कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर भी करा लिए गए।

आरोप है कि वर्ष 2018 में फर्म की बची हुई करीब 85 प्रतिशत जमीन को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम कराया गया।

परिवादी का दावा है कि बंटवारे के लिए तहसील कार्यालय में ऐसा दस्तावेज भी प्रस्तुत किया गया, जिस पर उसके हस्ताक्षर नहीं थे। इसी बिंदु को लेकर उसने राजस्व रिकॉर्ड और दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए हैं।

रेल्वे मुआवजे के लिए जमीन बांटने का आरोप

शिकायत में भूमि बंटवारे के पीछे रेलवे मुआवजा हासिल करने की साजिश का गंभीर आरोप लगाया गया है।

परिवादी के मुताबिक 22 सितंबर 2018 के राजपत्र में दुर्ग कॉरिडोर से बलौदाबाजार होते हुए खरसिया तक रेल लाइन प्रस्तावित होने के बाद संबंधित क्षेत्र की जमीन के अधिग्रहण और मुआवजे की संभावना बनी थी।

आरोप है कि इसी संभावना को देखते हुए रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स की जमीन को अलग-अलग खसरों और हिस्सों में बांटकर आरोपियों तथा उनके परिवार के सदस्यों के नाम किया गया, ताकि भविष्य में सरकारी दर पर मिलने वाले मुआवजे का लाभ हासिल किया जा सके।

यह वर्तमान में परिवादी का आरोप है। मुआवजा किसे मिला, कितनी रकम मिली और भूमि बंटवारे का उद्देश्य वास्तव में क्या था—इन सभी बिंदुओं की पुलिस जांच करेगी।

तहसील रिकॉर्ड गायब सवालों के घेरे में

परिवादी ने जमीन बंटवारे से संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी शिकायत की। उसके अनुसार बंटवारे के आवेदन, साझेदारों की सहमति, पटवारी प्रतिवेदन, फर्द बंटवारा, नोटरी शपथपत्र और तहसीलदार के आदेश जैसे दस्तावेज रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं मिले।

इस मामले में उसने दुर्ग कलेक्टर से शिकायत की थी। शिकायत के बाद संबंधित रिकॉर्ड की जांच और एफआईआर की कार्रवाई के निर्देश दिए जाने का भी न्यायालयीन दस्तावेजों में उल्लेख है।

जांच में तत्कालीन तहसीलदार द्वारा दस्तावेज लिए जाने की बात सामने आने का उल्लेख है, जबकि तत्कालीन हल्का पटवारी ने दस्तावेज प्राप्त नहीं करने की बात कही। इसी विरोधाभास ने मामले को और गंभीर बना दिया।

कॉलोनाइजर लाइसेंस में भी कथित हेराफेरी

शिकायत में वर्ष 2009 के कॉलोनाइजर लाइसेंस का भी उल्लेख है। आरोप है कि रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स साझेदारी फर्म होने के बावजूद सजल जैन ने खुद को प्रोपराइटर बताते हुए नगर निगम दुर्ग से कॉलोनाइजर लाइसेंस प्राप्त किया।

परिवादी ने इसे फर्म की वास्तविक स्थिति छिपाकर दस्तावेजों में कथित हेराफेरी बताया है। पुलिस अब संबंधित लाइसेंस, आवेदन और उस समय प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों की जांच करेगी।

फ्लैट बुकिंग के नाम पर रकम लेने का अलग मामला भी दर्ज

रिद्धि-सिद्धी बिल्डर्स से जुड़े मामले में फ्लैट बुकिंग के नाम पर लोगों से रकम लेने का भी आरोप है। शिकायत में पदम जैन, रेणु देवी जैन, रूपाली जैन और आरती जैन सहित अन्य लोगों से रकम लेने का उल्लेख किया गया है।

आरोप है कि रकम लेने के बाद न तो फ्लैट दिए गए और न ही पैसा वापस किया गया।

इस मामले में न्यायालय के निर्देश पर पहले ही थाना कोतवाली दुर्ग में अपराध क्रमांक 151/2026 दर्ज हो चुका है। इसकी जांच वर्तमान में लंबित बताई गई है।

पहले कलेक्टर और पुलिस तक पहुंचा था मामला

परिवादी ने जमीन और दस्तावेजों को लेकर पहले भी दुर्ग कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और अन्य अधिकारियों को शिकायतें देने की बात न्यायालय के सामने रखी।

उसका आरोप है कि शिकायतों के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने न्यायालय में धारा 175(3) बीएनएसएस के तहत आवेदन प्रस्तुत किया।

न्यायालय ने आवेदन के साथ लगाए गए दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध के संकेत पाए और पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया।

कोर्ट के आदेश के बाद FIR, अब जांच में खुलेगा सच

न्यायालय के आदेश पर सिटी कोतवाली दुर्ग पुलिस ने परिवाद के आधार पर धारा 420/34 भादवि के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना शुरू कर दी है।

शिकायतकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता की धोखाधड़ी, कूटरचना, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराओं में भी कार्रवाई की मांग की थी।

अब इन बिंदुओं पर होगी पुलिस की जांच

पुलिस की जांच में फर्म की वर्ष 2009 की पार्टनरशिप डीड, जमीन की खरीदी, खसरा रिकॉर्ड, वर्ष 2018 के कथित बंटवारे, तहसील दस्तावेज, हस्ताक्षरों की सत्यता, कॉलोनाइजर लाइसेंस, फ्लैट बुकिंग और निवेशकों से ली गई रकम की पड़ताल की जाएगी।

इसके साथ ही रेलवे भूमि अधिग्रहण और संभावित मुआवजे से पहले जमीन के कथित विभाजन की टाइमलाइन भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

पुलिस यह भी जांच करेगी कि जमीन वास्तव में किसके नाम थी, उसका बंटवारा किस प्रक्रिया से हुआ, संबंधित दस्तावेज किसने तैयार किए और उनमें किसी तरह की कूटरचना या हेराफेरी हुई या नहीं।

फिलहाल कांतिलाल बोथरा, सजल जैन और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोप परिवादी के आरोप हैं और जांच के अधीन हैं। पुलिस जांच और दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।

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Vaibhav Chandrakar

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