शिवगढ़ प्रेस / दुर्ग,- कहते हैं इंसान की असली पहचान उसके जीवन के साथ-साथ उसके जाने के बाद भी समाज के लिए किए गए कार्यों से होती है। मृत्यु किसी व्यक्ति की कहानी का अंत जरूर करती है, लेकिन यदि वही अंत किसी और की जिंदगी का सहारा बन जाए, तो उससे बड़ी विरासत और कोई नहीं। अर्जुंदा नगर के 78 वर्षीय प्रह्लाद चंद्राकर की मृत्यु के बाद उनके बेटे भूपेंद्र चंद्राकर ने जो साहसिक और मानवीय निर्णय लिया, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।
इलाज के दौरान हुआ था निधन
16 अगस्त को ब्रेन हेमरेज के बाद प्रह्लाद चंद्राकर को रायपुर के डीकेएस सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। न्यूरोसर्जरी विभाग में नौ दिनों तक चले इलाज के बाद 27 अगस्त की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। इस कठिन और भावनात्मक क्षण में परिवार गहरे शोक में डूबा था। लेकिन इसी बीच बेटे भूपेंद्र ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को याद किया। दो साल पहले प्रह्लाद चंद्राकर ने खुद अंगदान की इच्छा जताई थी और इसका फॉर्म भी भरा था।
पिता की अंतिम इच्छा अनुसार नेत्र दान और त्वचा दान का लिया निर्णय
अस्पताल के उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा और काउंसलर मीना शर्मा ने परिवार को अंगदान के महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्हें बताया गया कि त्वचा दान से आगजनी या गंभीर हादसों में झुलसे मरीजों की प्लास्टिक सर्जरी संभव होती है, वहीं नेत्रदान से अंधकार में जी रहे लोगों को रोशनी मिल सकती है। यह जानकारी पाकर भूपेंद्र ने अपने पिता के नेत्र और त्वचा दान करने का साहसिक निर्णय लिया।
परिवार को प्रशंसा पत्र देकर किया गया सम्मानित
रात करीब तीन बजे यह प्रक्रिया पूरी की गई। दान की गई आंखों को आंबेडकर अस्पताल के आई बैंक में सुरक्षित रखा गया, जबकि त्वचा को डीकेएस अस्पताल परिसर स्थित स्किन बैंक में संग्रहित किया गया। नेत्र रोग विभाग के संजय शर्मा और पूरी टीम ने इस प्रक्रिया को सफल बनाने में विशेष भूमिका निभाई। इस महान कार्य के लिए अस्पताल प्रबंधन ने परिवार को प्रशंसा पत्र भेंट कर सम्मानित किया।

भूपेंद्र ने बताया कि पिताजी ने कहा था कि जब मैं इस दुनिया से जाऊं, तो मेरा शरीर किसी और के काम आना चाहिए। आज उनकी यह इच्छा पूरी हुई है।” हालांकि, पैरालिसिस की वजह से उनकी किडनी का उपयोग संभव नहीं हो पाया, लेकिन आंखें और त्वचा कई जिंदगियों को संवारने का जरिया जरूर बन गईं।

स्व. प्रहलाद चंद्राकर का परिचय
प्रह्लाद चंद्राकर मूलतः ग्राम
सांकरा (जगन्नाथपुर) के निवासी थे और वर्तमान में अर्जुंदा में रह रहे थे। वे नगर पंचायत अर्जुंदा के पूर्व अध्यक्ष हरिश चंद्राकर के पिता और स्व. चंदूलाल चंद्राकर के भतीजे थे। उनका दशगात्र कार्यक्रम 5 सितंबर को अर्जुंदा में होगा।

प्रह्लाद चंद्राकर का निधन परिवार और समाज दोनों के लिए अपूरणीय क्षति है। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी देह ने कई अनजाने लोगों को नई उम्मीद, नई रोशनी और नया जीवन दिया। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि किसी और के लिए नई शुरुआत हो सकती है।
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