शिवगढ़ प्रेस : दुर्ग : बालोद :- बालोद जिले के ग्राम पंचायत डौकीडीह (द्वारकाडीह) में 100 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए शीतला माता दरबार में खिचड़ी बनाकर खाते हैं , ऐसी परंपरा छत्तीसगढ में कही नहीं है।
बालोद जिला गुण्डरदेही ब्लॉक के अंतिम छोर गांव ग्राम पंचायत डौकीडीह (द्वारकाडीह) इस गांव में अक्षय तृतीया के दिन पूरे गांव के बाबा जी का मठ हैं और ठाकुर देव के पास पूजा अर्चना करके गांव के शीतला माता के दरबार में पुरे गांव के लोग खिचड़ी बनाकर खाते हैं। यही परंपरा ही अभी भी चलते आ रहे हैं।

गांव के किसान व अध्यक्ष सेवा सहकारी समिति खप्परवाड़ा डौकीडीह निवासी घनश्याम चन्द्राकर ने बताया कि यह परंपरा सौ साल से चली आ रही हैं। पहली बार एक महामारी बीमारी फैला हुआ था और गांव में महामारी से परेशान थे तब गांव में एक बाबा जी आये थे, कुछ दिन तक वहीं गांव में घुम रहे थे और गांव वाले को बोले कि मेरा समाधि स्थल यही बनाना और कहा कि पुरे गांव वाले मिलकर इस महामारी बीमारी को दूर करना है,तो तब गांव के ठाकुर देव और मेरे समाधि स्थल में अक्षय तृतीया के दिन ठाकुर देव , परसा , पीपल के पत्ता में धान को लेकर चढ़ाते हैं और शीतला दरबार में पूजा अर्चना करते हैं, वहां सिर्फ पुरूष लोग घर से चांवल,उड़द दाल, गुड़ तीनों को मिलाकर खिचड़ी बनाते हैं और आम के आचार के साथ खाते हैं। यह परंपरा कई वर्षों से चले आ रहे हैं ।
यहां सुबह 8 बजे से 12 बजे तक सिर्फ पुरुष लोग ही खिचड़ी बना के खाते हैं। ऐसे परंपरा छत्तीसगढ़ में कहीं नहीं होता। इसके चलते आगामी वर्ष के लिए देवी – देवताओं का पूजा-पाठ करके ग्रामवासियों के लिए उज्जवल भविष्य की मनोकामना की।

इस अवसर पर गांव के बैगा गणेशराम साहू ,सरपंच ग्राम पंचायत डौकीडीह मोहन चंद्राकार,उपसरपंच राजेश साहू,, पंच भूषण चंद्राकार व ग्रामीण जन रोहित निषाद संतोष सेन,विवेक चंद्राकार, धनसिंग साहू,राजू चंद्राकार, तेजेन्द्र चंद्राकार,नवीन चंद्राकार,ईश्वर साहू,मनहरण निषाद,लोकेश चंद्राकार,ढालेंद्र चंद्राकार, कृष्णा चंद्राकार,धलेन्द चंद्राकार,भीषम साहू,भूषण चंद्राकार, चितरंजन साहू,डोमेन्द्र साहू,होरी लाल साहू,गुलाब साहू,राजेन्द्र साहू,बल्लू चंद्राकार, लोमेश चन्द्राकर, मेघनाथ साहू , हेमंत चंद्राकार, डाला राम चंद्राकार, प्रीत लाल चंद्राकर, डोमन सेन,घसु सेन,चेतन सेन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित थे।
बदलते सामाजिक परिवेश में आज भी ऐसी परपराएं कही न कही आपसी भाईचारा , प्रेम एकजूटता , सहयोग को प्रदर्शित करता है , जिससे अगली युवा पीढ़ी में इस संस्कार का बीजारोपण हो सके।
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