शिवगढ़ प्रेस / दुर्ग , – बच्चों को गढ़ने वाले गुरुओं को याद करने और सम्मानित करने का दिन है। लेकिन इस बार दुर्ग जिले से शिक्षा जगत की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आई हैं—एक ओर कुछ शिक्षक अपने दायित्वों से विमुख होकर हर्बल उत्पादों के प्रचार-प्रसार और नेटवर्किंग बिजनेस में लिप्त पाए गए, जिन पर विभाग ने कठोर कार्रवाई की है। वहीं दूसरी ओर जिले की एक शिक्षिका ने शिक्षा के क्षेत्र में अपने नवाचार और समर्पण से मिसाल कायम की है और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है।
हर्बल धंधे में फंसे शिक्षक, तीन निलंबित
जिले में हाल ही में प्रकाशित एक समाचार “दुर्ग में शिक्षक बने हर्बल गुरु, स्कूल की जगह अब फिटनेस और फार्मूला बेचने में व्यस्त” के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया। जांच में यह सामने आया कि कई शिक्षक स्कूल समय में हर्बल लाइफ उत्पादों की ऑनलाइन मीटिंग, सदस्यता दिलाने और प्रचार-प्रसार में व्यस्त रहते थे।

जांच प्रतिवेदन के आधार पर मुकेश चतुर्वेदी (शिक्षक, शा. पूर्व माध्यमिक शाला दनिया), बलदाउ पटेल (सीएसी, संकुल केंद्र बोरी, मूल पद–शिक्षक एल.बी.) और श्रीमती खिलेश्वरी चतुर्वेदी (सहायक शिक्षक, शा. प्राथमिक शाला फुण्डा) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
वहीं लोमन वर्मा (व्याख्याता, शा. उ.मा.वि. घोटवानी) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। जांच में प्रमाण मिला कि ये शिक्षक सोशल मीडिया और विदेश यात्राओं तक में हर्बल उत्पादों का प्रचार करते रहे।
संभागीय संयुक्त संचालक हेमंत उपाध्याय ने आदेश जारी कर कहा कि ऐसे कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के खिलाफ गंभीर कदाचार हैं और भविष्य में भी ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद मिश्रा ने स्पष्ट किया कि शिक्षक की पहली जिम्मेदारी बच्चों को पढ़ाना है, व्यवसाय नहीं।
समर्पण से सम्मान: डॉ. प्रज्ञा सिंह को राष्ट्रपति पुरस्कार
वहीं दूसरी ओर जिले की शिक्षिका डॉ. प्रज्ञा सिंह, हनोदा माध्यमिक स्कूल, ने शिक्षा में नवाचार कर एक नई पहचान बनाई है। उन्हें 5 सितंबर को दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा जाएगा।

डॉ. सिंह ने अपनी निजी बचत से करीब 8 लाख रुपये खर्च कर स्कूल में लैब, लाइब्रेरी, गणित पार्क और उल्लास केंद्र तैयार किए। उन्होंने पढ़ाई में खेल और संस्कृति को शामिल किया—लूडो, सांप-सीढ़ी और छत्तीसगढ़ी परंपराओं के जरिए बच्चों को कठिन विषय समझाना आसान बना दिया। आज उनके स्कूल में पढ़ने वाले 350 से अधिक बच्चों का शैक्षिक और व्यक्तित्व विकास हो रहा है। कई विद्यार्थी उच्च शिक्षा में चयनित भी हुए हैं।

डॉ. सिंह कहती हैं—“शिक्षक का असली धर्म बच्चों में जिज्ञासा जगाना और उन्हें बेहतर भविष्य देना है। सम्मान बच्चों की प्रगति से ही मिलता है।”
शिक्षक दिवस पर सवाल
एक तरफ शिक्षक कर्तव्य से भटककर बच्चों का भविष्य अंधकार में डाल रहे हैं, तो दूसरी तरफ एक शिक्षिका का समर्पण प्रदेश के लिए प्रेरणा बन रहा है। यह दोहरी तस्वीर सोचने पर मजबूर करती है कि आने वाली पीढ़ी को कैसा शिक्षा वातावरण मिल रहा है।
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